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ये घनी छाँव ये ठंडक ये दिल-ओ-जाँ का सुकूँ | शाही शायरी
ye ghani chhanw ye ThanDak ye dil-o-jaan ka sukun

ग़ज़ल

ये घनी छाँव ये ठंडक ये दिल-ओ-जाँ का सुकूँ

राम कृष्ण मुज़्तर

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ये घनी छाँव ये ठंडक ये दिल-ओ-जाँ का सुकूँ
मेरी आँखों पे तिरे गेसू-ए-पुर-ख़म तो नहीं

लज़्ज़त-ए-दर्द वही है वही कैफ़िय्यत-ए-ज़ीस्त
इल्तिफ़ात-ए-निगह-ए-नाज़ अभी कम तो नहीं

दिल के अरमान मचलते ही चले जाते हैं
ये सियह-रात तिरी काकुल-ए-बरहम तो नहीं

उलझनें शौक़ की बढ़ती ही चली जाती हैं
आज ज़ुल्फ़ों में तिरी कोई नया ख़म तो नहीं

ख़ुद को भूले हुए दुनिया से गुरेज़ाँ रहना
ये कहीं तेरी मोहब्बत ही का आलम तो नहीं

डबडबा आएँ मुझे देख के आँखें उस की
हाए बे-दर्द मिरे दर्द-ए-मोहर्रम तो नहीं

रह गईं जम के ये किस पर मिरी नज़रें 'मुज़्तर'
रू-ब-रू आज वही हुस्न-ए-मुजस्सम तो नहीं