EN اردو
ये फ़ज़ा-ए-साज़-ओ-मुज़रिब ये हुजूम-ताज-ए-दाराँ | शाही शायरी
ye faza-e-saz-o-muzrib ye hujum-e-taj-e-daran

ग़ज़ल

ये फ़ज़ा-ए-साज़-ओ-मुज़रिब ये हुजूम-ताज-ए-दाराँ

अज़ीज़ हामिद मदनी

;

ये फ़ज़ा-ए-साज़-ओ-मुज़रिब ये हुजूम-ताज-ए-दाराँ
चलो आओ हम भी निकलें ब-लिबास-ए-सोगवाराँ

ये फुसून-ए-रू-ए-लैला ब-अज़ाब-ए-जान-ए-मजनूँ
वही हुस्न-ए-दश्त-ओ-दर है ब-तवाफ़-ए-जाँ-निसाराँ

ग़म-ए-कारवाँ का आख़िर कोई रुख़ न उस से छूटा
वो हदीस कह गई है ये हवा-ए-रह-गुज़ाराँ

वो तअ'स्सुब-ए-बरहमन जो सनम को ढालता है
रुख़-ए-नक़्श पर भी आया ये सिपास-ए-नक़्श-ए-काराँ

ब-ख़याल-ए-दोस्त आख़िर कोई ख़्वाब-ए-हम-किनारी
कोई ख़्वाब-ए-हम-किनारी शब-ए-ख़्वाब-ए-बे-क़राराँ

सर-ए-किश्त-ए-ग़ैर क्या क्या ये घटा बरस रही है
कोई हम से आ के पूछे असर-ए-दुआ-ए-बाराँ

वो शिकस्त-ए-ख़्वाब-ए-महफ़िल वो हवा के चार झोंके
लगी दिल पे तीर बन कर दम-ए-सुब्ह याद-ए-याराँ