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ये फ़क़त शोरिश-ए-हवा तो नहीं | शाही शायरी
ye faqat shorish-e-hawa to nahin

ग़ज़ल

ये फ़क़त शोरिश-ए-हवा तो नहीं

रईस अमरोहवी

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ये फ़क़त शोरिश-ए-हवा तो नहीं
कोई मुझ को पुकारता तो नहीं

बोल ऐ अख़्तर-ए-ग़ुनूदा-ए-सुब्ह
कोई रातों को जागता तो नहीं

सुन कि ये मद्द-ओ-जज़्र-ए-साहिल-ए-बहर
माजराओं का माजरा तो नहीं

ज़ेहन पर एक खुरदुरी सी लकीर
कंखजूरे का रास्ता तो नहीं

रेत पर चढ़ रही है रेत की तह
बाबुल ओ मिस्र ओ नैनवा तो नहीं

नोक-ए-हर-ख़ार-ओ-ख़स है ख़ूँ-आलूद
रूह-ए-सहरा बरहना-पा तो नहीं

ऐ मिरी जान-ए-मुब्तला के सुकूँ
तू कोई जान-ए-मुब्तला तो नहीं

तेरे जिस्म-ए-हसीं में ख़्वाबीदा
बाग़-ए-जन्नत का अज़दहा तो नहीं