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ये फ़लक ये माह-ओ-अंजुम ये ज़मीन ये ज़माना | शाही शायरी
ye falak ye mah-o-anjum ye zamin ye zamana

ग़ज़ल

ये फ़लक ये माह-ओ-अंजुम ये ज़मीन ये ज़माना

जिगर मुरादाबादी

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ये फ़लक ये माह-ओ-अंजुम ये ज़मीन ये ज़माना
तिरे हुस्न की हिकायत मिरे इश्क़ का फ़साना

ये है इश्क़ की करामत ये कमाल-ए-शाइराना
अभी मुँह से बात निकली अभी हो गई फ़साना

ये मिरा पयाम कहना तू सबा मुअद्दबाना
कि गुज़र गया है प्यारे तुझे देखे इक ज़माना

मुझे चाक-ए-जेब-ओ-दामन से नहीं मुनासिबत कुछ
ये जुनूँ ही को मुबारक रह-ओ-रस्म-ए-आमियाना

तुझे हादसात-ए-पैहम से भी क्या मिलेगा नादाँ
तिरा दिल अगर हो ज़िंदा तो नफ़स भी ताज़ियाना

वो अदा-ए-दिलबरी हो कि नवा-ए-आशिक़ाना
जो दिलों को फ़तह कर ले वही फ़ातेह-ए-ज़माना