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ये दौर-ए-तरक़्क़ी है रिफ़अत का ज़माना है | शाही शायरी
ye daur-e-taraqqi hai rifat ka zamana hai

ग़ज़ल

ये दौर-ए-तरक़्क़ी है रिफ़अत का ज़माना है

सीमाब अकबराबादी

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ये दौर-ए-तरक़्क़ी है रिफ़अत का ज़माना है
ज़र्रों को उठाना है तारों से मिलाना है

आग़ोश-ए-तसव्वुर है और नक़्श-ए-जमील उन का
दूरी है न मजबूरी आना है न जाना है

नैरंग-ए-मोहब्बत है हर राज़ मिरे दिल का
चुप हूँ तो हक़ीक़त है कह दूँ तो फ़साना है

अरमान-ए-तजल्ली का कोताह भी कर क़िस्सा
ऐ दोस्त तुझे आख़िर इक दिन नज़र आना है

क्या शोबदा-सामाँ है 'सीमाब' ज़माना भी
हर शख़्स समझता है मेरा ही ज़माना है