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ये बे-नवाई हमारी सौदा-ए-सर है घर में बसा दिया है | शाही शायरी
ye be-nawai hamari sauda-e-sar hai ghar mein basa diya hai

ग़ज़ल

ये बे-नवाई हमारी सौदा-ए-सर है घर में बसा दिया है

राशिद आज़र

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ये बे-नवाई हमारी सौदा-ए-सर है घर में बसा दिया है
मकान ख़ाली है लेकिन इस को निगार-ख़ाना बना दिया है

तमाम उम्र-ए-अज़ीज़ अपनी इसी तरह से गँवाई हम ने
कभी जो सोए तो ख़्वाब देखा किसी ने हम को जगा दिया है

न कुछ रहा है कि हम ही रखते न कुछ बचा है कि तुम को देते
मता-ए-दिल थी लुटा के आए जो क़र्ज़-ए-जाँ था चुका दिया है

ये शान देखो क़लंदरों की है जिस पे दार-ओ-मदार-ए-हस्ती
वो आशियाँ फूँक कर हर इक शाख़ पर नशेमन बना दिया है

ये ज़िंदगी की सितम-ज़रीफ़ी नहीं तो फिर और क्या है 'आज़र'
वो जिन की ख़ातिर भटक रहे हैं उन्ही ने हम को भुला दिया है