EN اردو
उन से करम की रख उम्मीद उन की अता से प्यार कर | शाही शायरी
ان سے کرم کی رکھ امید ان کی عطا سے پیار کر

ग़ज़ल

उन से करम की रख उम्मीद उन की अता से प्यार कर

अज़ीज़ वारसी

;

उन से करम की रख उम्मीद उन की अता से प्यार कर
ऐ दिल-ए-मुब्तला-ए-ग़म ग़म को भी ख़ुश-गवार कर

हुस्न-ए-यक़ीन-ए-आशिक़ी इतना तू पाएदार कर
ख़ुद पर भी ए'तिमाद रख उन पर भी ए'तिबार कर

दिल में जो मेरे ज़ख़्म में उन का न अब शुमार कर
सीना-ए-दाग़-दार को और भी दाग़-दार कर

शोरिश-ए-आगही के साथ हुस्न-ए-शुऊ'र शर्त है
ज़ौक़-ए-जुनूँ-नवाज़ अब और न शर्मसार कर

तुझ से हनूज़ है निहाँ फ़िक्र का इक नया जहाँ
अज़्म-ओ-अमल से ज़ीस्त के हुस्न को आश्कार कर

हासिल-ए-काएनात थे बस वही ज़िंदगी के दिन
हम तेरी बारगाह में आए हैं जो गुज़ार कर

सीना-ए-तीरगी से ही फूटेगी एक मौज-ए-नूर
मुंतज़िर हयात-ए-नौ सुब्ह का इंतिज़ार कर

दर्द-ए-हयात दर्द-ए-दिल दर्द-ए-फ़िराक़ दर्द-ए-ग़म
ये हैं मता-ए-ला-ज़वाल इन से 'अज़ीज़' प्यार कर