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ये बात मुन्कशिफ़ हुई चराग़ के बग़ैर भी | शाही शायरी
ye baat munkashif hui charag ke baghair bhi

ग़ज़ल

ये बात मुन्कशिफ़ हुई चराग़ के बग़ैर भी

रफ़ीक़ ख़याल

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ये बात मुन्कशिफ़ हुई चराग़ के बग़ैर भी
मैं ढूँड लूँगा हर ख़ुशी चराग़ के बग़ैर भी

हुआ था जिस जगह कभी विसाल-ए-यार दोस्तो
है उस जगह पे रौशनी चराग़ के बग़ैर भी

लिक्खी गई हैं जिस के साथ ज़िंदगी की मंज़िलें
वो आ मिलेगा आदमी चराग़ के बग़ैर भी

मसर्रतों के क़ाफ़िले लुटा रही है फिर मुझे
तिरी ये ख़ुद-सुपुर्दगी चराग़ के बग़ैर भी

मैं तज़्किरा करूँ तो क्या करूँ जमाल-ए-यार का
दमक रही थी दिलकशी चराग़ के बग़ैर भी

तुम्हारी एक याद बे-शुमार हसरतों के रंग
निगाह में सजा गई चराग़ के बग़ैर भी

गिला किसी से क्यूँ करूँ गुज़र ही जाएगी 'ख़याल'
ये मुख़्तसर सी ज़िंदगी चराग़ के बग़ैर भी