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ये और बात तेरी गली में न आएँ हम | शाही शायरी
ye aur baat teri gali mein na aaen hum

ग़ज़ल

ये और बात तेरी गली में न आएँ हम

हबीब जालिब

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ये और बात तेरी गली में न आएँ हम
लेकिन ये क्या कि शहर तिरा छोड़ जाएँ हम

मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ़ गए
आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएँ हम

शायद ब-क़ैद-ए-ज़ीस्त ये साअत न आ सके
तुम दास्तान-ए-शौक़ सुनो और सुनाएँ हम

बे-नूर हो चुकी है बहुत शहर की फ़ज़ा
तारीक रास्तों में कहीं खो न जाएँ हम

उस के बग़ैर आज बहुत जी उदास है
'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएँ हम