EN اردو
ये अश्क आँख में किस जुस्तुजू के साथ आए | शाही शायरी
ye ashk aankh mein kis justuju ke sath aae

ग़ज़ल

ये अश्क आँख में किस जुस्तुजू के साथ आए

फ़रासत रिज़वी

;

ये अश्क आँख में किस जुस्तुजू के साथ आए
कि तेरे ज़िक्र तिरी गुफ़्तुगू के साथ आए

मैं एक नख़्ल था यक-रंगी ख़िज़ाँ का असीर
ये सारे रंग तिरी आरज़ू के साथ आए

जो खो गए थे कहीं उम्र के धुँदलकों में
वो अक्स फिर किसी आईना-रू के साथ आए

फ़रोग़-ए-नश्शा-ए-मय से भी जी बहल न सका
बहुत से ग़म थे जो मौज-ए-सुबू के साथ आए

गिला न कर जो सर-ए-शहर जू-ए-ख़ूँ है रवाँ
कि इंक़लाब जब आए लहू के साथ आए

गए तो सिर्फ़ मता-ए-सुकूत ले के गए
जो इस नगर में बड़ी हाव-हू के साथ आए

'फ़रासत' अहल-ए-जहाँ हम-सफ़र हैं ख़ुशियों के
मक़ाम-ए-रंज तलक कब कसू के साथ आए