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यक़ीनन हम को घर अच्छे लगे थे | शाही शायरी
yaqinan hum ko ghar achchhe lage the

ग़ज़ल

यक़ीनन हम को घर अच्छे लगे थे

उबैद सिद्दीक़ी

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यक़ीनन हम को घर अच्छे लगे थे
मकीं पहले मगर अच्छे लगे थे

उसे रुख़्सत किया और उस से पहले
यही दीवार-ओ-दर अच्छे लगे थे

वो दरिया हिज्र का था तुंद दरिया
उदासी के भँवर अच्छे लगे थे

हमारे हाथ में पत्थर का आना
दरख़्तों पर समर अच्छे लगे थे

सऊबत तो सफ़र में लाज़मी थी
मगर कुछ हम-सफ़र अच्छे लगे थे

वो चेहरे जिन पे रौशन थी सदाक़त
लहू में तर-ब-तर अच्छे लगे थे