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यक़ीन कौन करेगा गुमाँ पे आया हूँ | शाही शायरी
yaqin kaun karega guman pe aaya hun

ग़ज़ल

यक़ीन कौन करेगा गुमाँ पे आया हूँ

अब्दुर्रहमान मोमिन

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यक़ीन कौन करेगा गुमाँ पे आया हूँ
मैं अपने आप से छुप कर यहाँ पे आया हूँ

मुझे भी अक़्ल परेशान करती रहती है
नहीं नहीं से गुज़र कर मैं हाँ पे आया हूँ

मुझे वो देख के हैरान क्यूँ नहीं होगा
ज़मीन ओढ़ के मैं आसमाँ पे आया हूँ

ये बात तू ही बता किस तरह बताऊँ तुझे
मैं दिल के रास्ते तेरी ज़बाँ पे आया हूँ

न जाने कब से नहीं मिल सका हूँ मैं ख़ुद से
मैं ख़ुद से मिलने तिरे आस्ताँ पे आया हूँ

ये इज़्तिराब हक़ीक़त में इज़्तिराब नहीं
ख़ुशी ख़ुशी मैं इस आह-ओ-फ़ुग़ाँ पे आया हूँ

मुझे तलाश न कर तू यहाँ वहाँ 'मोमिन'
नज़र उठा कि तिरे ख़्वाब-दाँ पे आया हूँ