EN اردو
यही इक जिस्म-ए-फ़ानी जावेदानी का अहाता करने वाला है | शाही शायरी
yahi ek jism-e-fani jawedani ka ahata karne wala hai

ग़ज़ल

यही इक जिस्म-ए-फ़ानी जावेदानी का अहाता करने वाला है

ऐनुद्दीन आज़िम

;

यही इक जिस्म-ए-फ़ानी जावेदानी का अहाता करने वाला है
किराए का मकाँ ही ला-मकानी का अहाता करने वाला है

ठहर जाओ घड़ी भर धड़कनों इस तेज़-रौ का जाएज़ा ले लूँ
सुकूँ अंदर का बाहर की रवानी का अहाता करने वाला है

इसे आँसू समझ कर मत गिराओ रहने दो पलकों पे ही गोया
यही क़तरा तुम्हारी बे-ज़बानी का अहाता करने वाला है

गिला बरसों का है जितनी सफ़ाई दोगे उतना तूल पकड़ेगा
अब हर्फ़-ए-माज़रत ही लन्तरानी का अहाता करने वाला है

इन आँखों में ग़ज़ल का वो मुकम्मल इस्तिआ'रा है कि जो 'आज़िम'
ख़ुतूत-ए-जिस्म के लफ़्ज़-ओ-मआनी का अहाता करने वाला है