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यहाँ तक काम आया जज़्बा-ए-ज़ब्त-ए-फुग़ाँ अपना | शाही शायरी
yahan tak kaam aaya jazba-e-zabt-e-fughan apna

ग़ज़ल

यहाँ तक काम आया जज़्बा-ए-ज़ब्त-ए-फुग़ाँ अपना

शोला करारवी

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यहाँ तक काम आया जज़्बा-ए-ज़ब्त-ए-फुग़ाँ अपना
खड़े देखा किए जलते हुए हम आशियाँ अपना

हक़ीक़त में वही है हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ अपना
जिसे सब मौत कहते हैं वो है ख़्वाब-ए-गिराँ अपना

बहुत कुछ हो चुका तय जादा-ए-उम्र-ए-रवाँ अपना
पहुँच जाएगा मंज़िल पर किसी दिन कारवाँ अपना

जहाँ में मौत ने उल्टी नक़ाब-ए-ज़िंदगी जिस दम
यक़ीं से ख़ुद बदलना ही पड़ा आख़िर गुमाँ अपना

यहीं किश्त-ए-तमन्ना है यहीं है मज़रा-ए-उक़्बा
इसी दो दिन की दुनिया में है सारा इम्तिहाँ अपना

नहीं जब कोई धब्बा दामन-ए-अस्लाफ़ पे अपने
तो फिर अच्छे से अच्छा क्यूँ न होगा दूद-माँ अपना

निशान-ए-क़ब्र भी ढूँढे से अब मिलता नहीं 'शो'ला'
मिटा है सफ़्हा-ए-हस्ती से यूँ नाम-ओ-निशाँ अपना