यहाँ तक काम आया जज़्बा-ए-ज़ब्त-ए-फुग़ाँ अपना
खड़े देखा किए जलते हुए हम आशियाँ अपना
हक़ीक़त में वही है हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ अपना
जिसे सब मौत कहते हैं वो है ख़्वाब-ए-गिराँ अपना
बहुत कुछ हो चुका तय जादा-ए-उम्र-ए-रवाँ अपना
पहुँच जाएगा मंज़िल पर किसी दिन कारवाँ अपना
जहाँ में मौत ने उल्टी नक़ाब-ए-ज़िंदगी जिस दम
यक़ीं से ख़ुद बदलना ही पड़ा आख़िर गुमाँ अपना
यहीं किश्त-ए-तमन्ना है यहीं है मज़रा-ए-उक़्बा
इसी दो दिन की दुनिया में है सारा इम्तिहाँ अपना
नहीं जब कोई धब्बा दामन-ए-अस्लाफ़ पे अपने
तो फिर अच्छे से अच्छा क्यूँ न होगा दूद-माँ अपना
निशान-ए-क़ब्र भी ढूँढे से अब मिलता नहीं 'शो'ला'
मिटा है सफ़्हा-ए-हस्ती से यूँ नाम-ओ-निशाँ अपना
ग़ज़ल
यहाँ तक काम आया जज़्बा-ए-ज़ब्त-ए-फुग़ाँ अपना
शोला करारवी

