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यास-ओ-उमीद-ओ-शादी-ओ-ग़म ने धूम उठाई सीने में | शाही शायरी
yas-o-umid-o-shadi-o-gham ne dhum uThai sine mein

ग़ज़ल

यास-ओ-उमीद-ओ-शादी-ओ-ग़म ने धूम उठाई सीने में

इंशा अल्लाह ख़ान

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यास-ओ-उमीद-ओ-शादी-ओ-ग़म ने धूम उठाई सीने में
ख़ूब मुझे है आज धमा-धम मार-कुटाई सीने में

दीद किया जो वादी-ए-मजनूँ हम ने धुन में वहशत के
शक्ल मुजस्सम हो के जुनूँ की आन समाई सीने में

शैख़-ओ-बरहमन दैर-ओ-हरम में ढूँढते हो क्या ला-हासिल
मूँद के आँखें देखो तो है सारी ख़ुदाई सीने में

क़हर किया ये तुम ने साहब आँख लड़ाना आफ़त था
झट-पट दिल को फूँक दिया और आग लगाई सीने में

हज़रत-ए-दिल तो कब के सिधारे ख़ूब जो ढूँडा 'इंशा' ने
एक धुआँ सा आह का उट्ठा ख़ाक न पाई सीना में