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यारों की हम से दिल-शिकनी हो सके कहाँ | शाही शायरी
yaron ki humse dil-shikani ho sake kahan

ग़ज़ल

यारों की हम से दिल-शिकनी हो सके कहाँ

इमाम बख़्श नासिख़

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यारों की हम से दिल-शिकनी हो सके कहाँ
याँ पास है न ख़ातिर-ए-अग़्यार तोड़िए

हम जौर-ए-चश्म-ए-यार से दम मारते नहीं
या'नी रवा है कब दिल-ए-बीमार तोड़िए

याँ दर्द-ए-सर ख़ुमार से है वाँ दुकान बंद
टकरा के सर को अब दर-ए-ख़ुम्मार तोड़िए

टकराऊँ वाँ जो सर तो वो कहता है क्या मुझे
साहब न मुझ ग़रीब की दीवार तोड़िए

दम तोड़ना है फ़ुर्क़त-ए-जानाँ में अपना काम
कुछ कोहकन नहीं हैं जो कोहसार तोड़िए

'नासिख़' बक़ौल-ए-अफ़सह-ए-हिन्दोस्ताँ कभी
ज़ाहिद का दिल न ख़ाना-ए-ख़ु़म्मार तोड़िए