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यारब सराब-ए-अहल-ए-हवस से नजात दे | शाही शायरी
yarab sarab-e-ahal-e-hawas se najat de

ग़ज़ल

यारब सराब-ए-अहल-ए-हवस से नजात दे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

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यारब सराब-ए-अहल-ए-हवस से नजात दे
मुझ को शराब दे उन्हें आब-ए-हयात दे

आ हम भी रक़्स-ए-शौक़ करें रक़्स-ए-मुल के साथ
ऐ गर्दिश-ए-ज़माँ मेरे हाथों में हात दे

अपना सुबू भी आइना-ए-जम से कम नहीं
रखें जो रू-ब-रू ख़बर-ए-शश-जिहात दे

ऐ दस्त-ए-राज़ मरकब-ए-दौराँ है सुस्त-रौ
ला मेरे हाथ में रसन-ए-काएनात दे

कुछ तो खुले कि क्या है पस-ए-पर्दा-ए-हयात
कोई पता तो आइना-ए-हुस्न-ए-ज़ात दे

ऐ दोस्त इस ज़मान-ओ-मकाँ के अज़ाब में
दुश्मन है जो किसी को दुआ-ए-हयात दे

उठ रहगुज़र से ऐ दर-ए-मय-ख़ाना के गदा
मसनद पे बैठ फ़ैसला-ए-काएनात दे

इस मौजा-ए-सुरूर की है आरज़ू 'ज़फ़र'
जो तब्अ' को रवानी-ए-नील-ओ-फुरात दे