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यार को बेबाकी में अपना सा हम ने कर लिया | शाही शायरी
yar ko bebaki mein apna sa humne kar liya

ग़ज़ल

यार को बेबाकी में अपना सा हम ने कर लिया

रज़ा अज़ीमाबादी

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यार को बेबाकी में अपना सा हम ने कर लिया
यानी उस ने ठोकरों में सर हमारा धर लिया

इश्क़-ए-रुस्वा ने दी अफ़्ज़ूनी हिजाब-ए-हुस्न को
जो उठा पर्दा यहाँ से उस ने वाँ मुँह पर लिया

इस को मय-ख़्वारी नहीं कहते हैं ख़ूँ-ख़्वारी है ये
मेरे दिल से ली गज़क और ग़ैर से साग़र लिया

नाम को दिल में जगह छोड़ी न दाग़-ए-इश्क़ ने
एक मेहमाँ ऐसा आया जिस ने सारा घर लिया

ज़ौक़ देखो मुझ से सैद-ए-नातवाँ के वास्ते
तेग़ ली इक हाथ में इक हाथ में ख़ंजर लिया

मैं सितारा-सोख़्ता वो हूँ कि जिस का ज़ाइचा
उस घड़ी खींचा गया जब दाग़ का अख़्तर लिया

चश्म-ओ-दिल रक्खो हो यारो जाव टुक देखो उसे
मुझ से क्या कहते हो उस ने दिल तिरा क्यूँ-कर लिया

ऐ 'रज़ा' राह में ख़िज़्र की मत राह देख
घर के जाने में किसी ने भी भला रहबर लिया