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याद तेरी फ़लक-ए-पीर लिए बैठे हैं | शाही शायरी
yaad teri falak-e-pir liye baiThe hain

ग़ज़ल

याद तेरी फ़लक-ए-पीर लिए बैठे हैं

शोला करारवी

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याद तेरी फ़लक-ए-पीर लिए बैठे हैं
शिकवा-ए-गर्दिश-ए-तक़दीर लिए बैठे हैं

बे-असर नाला-ए-शब-गीर लिए बैठे हैं
एक टूटी हुई ज़ंजीर लिए बैठे हैं

मुसहफ़-ए-हुस्न की तफ़्सीर लिए बैठे हैं
दिल में हम आप की तस्वीर लिए बैठे हैं

जाने कब मुंहदिम अरकान-ए-अनासिर हो जाएँ
रेत पर जिस्म की ता'मीर लिए बैठे हैं

उस ने दुज़्दीदा निगाहों से कभी देखा था
दिल में अब तक ख़लिश-ए-तीर लिए बैठे हैं

नक़्श-बर-आब है दर-अस्ल हबाब-ए-हस्ती
कब ये मुमकिन है जो ता'मीर लिए बैठे हैं

एक ही आह में बरहम है निज़ाम-ए-आलम
अपने नालों में वो तासीर लिए बैठे हैं

ज़िंदगी मौत है और मौत हयात-ए-जावेद
ख़्वाब-ए-हस्ती की ये ता'बीर लिए बैठे हैं

दौर-ए-हाज़िर में ग़नीमत है बहुत ऐ 'शो'ला'
आप जो इज़्ज़त-ओ-तौक़ीर लिए बैठे हैं