याद के सहरा में कुछ तो ज़िंदगी आए नज़र
सोचता हूँ अब बना लूँ रेत से ही कोई घर
किस क़दर यादें उभर आई हैं तेरे नाम से
एक पत्थर फेंकने से पड़ गए कितने भँवर
वक़्त के अंधे कुएँ में पल रही है ज़िंदगी
ऐ मिरे हुस्न-ए-तख़य्युल बाम से नीचे उतर
तू असीर-ए-आबरू-ए-शेवा-ए-पिंदार-ए-हुस्न
मैं गिरफ़्तार-ए-निगाह-ए-ज़िंदगी-ए-मुख़्तसर
ज़ब्त के क़र्ये में 'अमजद' देखिए कैसे कटे
सोच की सूनी सड़क पर याद का लम्बा सफ़र
ग़ज़ल
याद के सहरा में कुछ तो ज़िंदगी आए नज़र
अमजद इस्लाम अमजद

