या फ़क़ीरी है या कि शाही है
इश्क़ में दोनों रू-सियाही है
इस तरह उस को मौत दे यारब
ज़िंदगी मेरी जिस ने चाही है
अपना दिखला दे गोशा-ए-दस्तार
गुल को दावा-ए-कज-कुलाही है
क्यूँके उस पर न ऐ 'रज़ा' मरिए
ख़ूबसूरत और सिपाही है
ग़ज़ल
या फ़क़ीरी है या कि शाही है
रज़ा अज़ीमाबादी

