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या फ़क़ीरी है या कि शाही है | शाही शायरी
ya faqiri hai ya ki shahi hai

ग़ज़ल

या फ़क़ीरी है या कि शाही है

रज़ा अज़ीमाबादी

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या फ़क़ीरी है या कि शाही है
इश्क़ में दोनों रू-सियाही है

इस तरह उस को मौत दे यारब
ज़िंदगी मेरी जिस ने चाही है

अपना दिखला दे गोशा-ए-दस्तार
गुल को दावा-ए-कज-कुलाही है

क्यूँके उस पर न ऐ 'रज़ा' मरिए
ख़ूबसूरत और सिपाही है