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वुसअतें महदूद हैं इदराक-ए-इंसाँ के लिए | शाही शायरी
wusaten mahdud hain idrak-e-insan ke liye

ग़ज़ल

वुसअतें महदूद हैं इदराक-ए-इंसाँ के लिए

सीमाब अकबराबादी

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वुसअतें महदूद हैं इदराक-ए-इंसाँ के लिए
वर्ना हर ज़र्रा है दुनिया चश्म-ए-इरफ़ाँ के लिए

ऐ ख़िज़ाँ तू शौक़ के सारा चमन बर्बाद कर
चंद फांसें छोड़ जा मेरी रग-ए-जाँ के लिए

दूर पहुँचीं शोहरतें रफ़्तार सेहर-आसार की
खुल गए रस्ते तिरे हुस्न-ए-ख़रामाँ के लिए

फूल गुलशन के नहीं तो ख़ाक-ए-सहरा ही सही
कुछ न कुछ तो चाहिए तसकीन-ए-दामाँ के लिए

इस लिए देता दिल तुम को कि लो और भूल जाओ
मैं ने इक तस्वीर दी है ताक़-ए-निस्याँ के लिए

धज्जियाँ उड़ने को ऐ 'सीमाब' वुसअत चाहिए
है कोई मैदान आशोब-ए-गरेबाँ के लिए