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वुसअत-ए-दामन-ए-सहरा देखूँ | शाही शायरी
wusat-e-daman-e-sahra dekhun

ग़ज़ल

वुसअत-ए-दामन-ए-सहरा देखूँ

आदिल मंसूरी

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वुसअत-ए-दामन-ए-सहरा देखूँ
अपनी आवाज़ को फैला देखूँ

हाथ में चाँद को पिघला देखूँ
ख़्वाब देखूँ कि ख़राबा देखूँ

सत्ह पर अक्स को बहता देखूँ
दरिया दरिया तिरा साया देखूँ

ख़ुद को देखूँ तिरा चेहरा देखूँ
आईना तोड़ दूँ फिर क्या देखूँ

अपने साए को बरहना पाऊँ
साथ रुस्वाई को हँसता देखूँ

रेतीली धूप में आते जाते
महमिल-ए-वक़्त को ठहरा देखूँ

सुब्ह के फूल को हँसता पा कर
रात की आँख में काँटा देखूँ

शहर में लोग जिसे ढूँडते हैं
अपने घर में उसे बैठा देखूँ

ऐसा दिन आए न हरगिज़ 'आदिल'
जैसे जी में उसे मरता देखूँ