वुफ़ूर-ए-ज़ोफ़ से दिल यार पर नहीं आता
ग़म-ए-फ़िराक़ में जीना नज़र नहीं आता
निगाह-ए-दीदा-ए-दिल से नज़र नहीं आता
ख़याल-ए-यार भी दो दो पहर नहीं आता
विसाल-ए-दोस्त भी बाद-ए-विसाल है शायद
कि जो उधर को गया फिर इधर नहीं आता
ग़ुबार-ए-चश्म भी है जुस्तुजू में सरगर्दां
हवा में ख़ाक भी वो राहबर नहीं आता
चढ़ाए गोर-ए-ग़रीबाँ पे कौन चादर-ए-गुल
चराग़ ले के कोई क़ब्र पर नहीं आता
ये रोज़ शाम से है सुब्ह तक ख़ुद-आराई
कि शब को आईना भी अपने घर नहीं आता
न शम्अ-रू पे भी दूँ जान मिस्ल-ए-परवाना
कि नाम-ए-इश्क़ को बदनाम कर नहीं आता
मैं शब को ला के उसे 'अर्श' ख़ाक हूँ हम-ख़्वाब
वो शोख़ ख़ाना-ख़राब अपने घर नहीं आता
ग़ज़ल
वुफ़ूर-ए-ज़ोफ़ से दिल यार पर नहीं आता
मीर कल्लू अर्श

