वो उन दिनों तो हमारा था लेकिन अब क्या है
फिर उस से आज वही रंज-ए-बे-सबब क्या है
तुम उस का वार बचाने की फ़िक्र में क्यूँ हो
वो जानता है मसीहाइयों का ढब क्या है
दबीज़ कोहर है या नर्म धूप की चादर
ख़बर नहीं तिरे बाद ऐ ग़ुबार-ए-शब क्या है
दिखा रहा है किसे वक़्त अन-गिनत मंज़र
अगर मैं कुछ भी नहीं हूँ तो फिर ये सब क्या है
अब इस क़दर भी सुकूँ मत दिखा बिछड़ते हुए
वो फिर तुझे न कभी मिल सके अजब क्या है
मैं अपने चेहरे से किस तरह ये नक़ाब उठाऊँ
समझ भी जा कि पस-ए-पर्दा-ए-तरब क्या है
यहाँ नहीं है ये दस्तूर-ए-गुफ़्तुगू 'इरफ़ान'
फ़ुग़ाँ सुने न कोई हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब क्या है
ग़ज़ल
वो उन दिनों तो हमारा था लेकिन अब क्या है
इरफ़ान सिद्दीक़ी

