वो सनम जब सूँ बसा दीदा-ए-हैरान में आ
आतिश-ए-इश्क़ पड़ी अक़्ल के सामान में आ
नाज़ देता नहीं गर रुख़्सत-ए-गुल-गश्त-ए-चमन
ऐ चमन-ज़ार-ए-हया दिल के गुलिस्तान में आ
ऐश है ऐश कि उस मह का ख़याल-ए-रौशन
शम्अ' रौशन किया मुझ दिल के शबिस्ताँ में आ
याद आता है मुझे वो दो गुल-ए-बाग़-ए-वफ़ा
अश्क करते हैं मकाँ गोशा-ए-दामान में आ
मौज-ए-बे-ताबी-ए-दिल अश्क में हुई जल्वा-नुमा
जब बसी ज़ुल्फ़-ए-सनम तब-ए-परेशान में आ
नाला-ओ-आह की तफ़्सील न पूछो मुझ सूँ
दफ़्तर-ए-दर्द बसा इश्क़ के दीवान में आ
पंजा-ए-इश्क़ ने बेताब किया जब सूँ मुझे
चाक-ए-दिल तब सूँ बसा चाक-ए-गरेबान में आ
देख ऐ अहल-ए-नज़र सब्ज़ा-ए-ख़त में लब-ए-लाल
रंग-ए-याक़ूत छुपा है ख़त-ए-रैहान में आ
हुस्न था पर्दा-ए-तजरीद में सब सूँ आज़ाद
तालिब-ए-इश्क़ हुआ सूरत-ए-इंसान में आ
शैख़ यहाँ बात तिरी पेश न जावे हरगिज़
अक़्ल कूँ छोड़ के मत मज्लिस-ए-रिंदान में आ
दर्द-मंदाँ को ब-जुज़ दर्द नहीं सैद मुराद
ऐ शह-ए-मुल्क-ए-जुनूँ ग़म के बयाबान में आ
हाकिम-ए-वक़्त है तुझ घर में रक़ीब-ए-बद-ख़ू
देव मुख़्तार हुआ मुल्क-ए-सुलैमान में आ
चश्मा-ए-आब-ए-बक़ा जग में किया है हासिल
यूसुफ़-ए-हुस्न तिरे चाह-ए-ज़नख़दान में आ
जग के ख़ूबाँ का नमक हो के नमक-पर्वर्दा
छुप रहा आ के तिरे लब के नमक-दान में आ
बस कि मुझ हाल सूँ हम-सर है परेशानी में
दर्द कहती है मिरा ज़ुल्फ़ तिरे कान में आ
ग़म सूँ तेरे है तरह्हुम का महल हाल-ए-'वली'
ज़ुल्म को छोड़ सजन शेवा-ए-एहसान में आ
ग़ज़ल
वो सनम जब सूँ बसा दीदा-ए-हैरान में आ
वली मोहम्मद वली