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वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ | शाही शायरी
wo samne tha phir bhi kahan samna hua

ग़ज़ल

वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ

शकेब जलाली

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वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ
रहता है अपने नूर में सूरज छुपा हुआ

ऐ रौशनी की लहर कभी तो पलट के आ
तुझ को बुला रहा है दरीचा खुला हुआ

सैराब किस तरह हो ज़मीं दूर दूर की
साहिल ने है नदी को मुक़य्यद किया हुआ

ऐ दोस्त चश्म-ए-शौक़ ने देखा है बार-हा
बिजली से तेरा नाम घटा पर लिखा हुआ

पहचानते नहीं उसे महफ़िल में दोस्त भी
चेहरा हो जिस का गर्द-ए-अलम से अटा हुआ

इस दौर में ख़ुलूस का क्या काम ऐ 'शकेब'
क्यूँ कर चले बिसात पे मोहरा पिटा हुआ