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वो रश्क-ए-मेहर-ओ-क़मर घात पर नहीं आता | शाही शायरी
wo rashk-e-mehr-o-qamar ghat par nahin aata

ग़ज़ल

वो रश्क-ए-मेहर-ओ-क़मर घात पर नहीं आता

इमदाद अली बहर

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वो रश्क-ए-मेहर-ओ-क़मर घात पर नहीं आता
कभी अँधेरे-उजाले नज़र नहीं आता

ये कह दो कूचा-ए-जानाँ के जाने वालों से
उधर जो कोई गया फिर इधर नहीं आता

तिलाई-रंग ये क्या क्या चले हैं तलवारें
किसी के क़ब्ज़े में वो कुंज-ए-ज़र नहीं आता

वो ना-तवाँ हूँ कि सुनता नहीं कोई मेरी
वो ज़ार हूँ कि किसी को नज़र नहीं आता

मिरी तरफ़ से ये ग़फ़लत है हम-सफ़ीरों को
चमन से उड़ के कभी एक पर नहीं आता

नहीं नसीब में अपनी जो दौलत-ए-बेदार
तो ख़्वाब में भी मिरा स्वयंवर नहीं आता

अज़ाब-ए-नज़अ' ही क़ासिद का इंतिज़ार मुझे
अजल ही आए अगर नामा-बर नहीं आता

वो कौन लोग हैं जिन पर हुमा है साया-फ़गन
यहाँ तो बूम भी बाला-ए-सर नहीं आता

यहाँ वसीला-ए-रोज़ी फ़क़त है याद-ए-ख़ुदा
कि हेच-कारा हैं कोई हुनर नहीं आता

बशर को चाहने अंजाम-ए-कार की कुछ फ़िक्र
जहान में कोई बार-ए-दिगर नहीं आता

सनम को हाथ से जाने न दीजिए ऐ 'बहर'
निकल के मुश्त-ए-सदफ़ से गुहर नहीं आता