वो मिरे ग़म में भी ख़ंदाँ नहीं होने पाता
हाए वो कुफ़्र जो ईमाँ नहीं होने पाता
वो नशेमन कि जो बरबाद बहाराँ हो जाए
वो कहीं सोख़्ता-सामाँ नहीं होने पाता
हो अगर होश भी एहसास-ए-बहाराँ में शरीक
चाक अपना भी गरेबाँ नहीं होने पाता
इतनी आसाँ भी ग़म-ए-दोस्त की तकमील नहीं
घर भी उजड़े तो बयाबाँ नहीं होने पाता
यूँ भी इक उम्र गुज़र जाती है मिलते मिलते
एक को एक का इरफ़ाँ नहीं होने पाता
'शोर' ख़ामोश नहीं मेरे ही ज़िंदाँ के चराग़
शहर-ए-ख़ूबाँ भी चराग़ाँ नहीं होने पाता
ग़ज़ल
वो मिरे ग़म में भी ख़ंदाँ नहीं होने पाता
मंज़ूर हुसैन शोर

