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वो मिरे ग़म में भी ख़ंदाँ नहीं होने पाता | शाही शायरी
wo mere gham mein bhi KHandan nahin hone pata

ग़ज़ल

वो मिरे ग़म में भी ख़ंदाँ नहीं होने पाता

मंज़ूर हुसैन शोर

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वो मिरे ग़म में भी ख़ंदाँ नहीं होने पाता
हाए वो कुफ़्र जो ईमाँ नहीं होने पाता

वो नशेमन कि जो बरबाद बहाराँ हो जाए
वो कहीं सोख़्ता-सामाँ नहीं होने पाता

हो अगर होश भी एहसास-ए-बहाराँ में शरीक
चाक अपना भी गरेबाँ नहीं होने पाता

इतनी आसाँ भी ग़म-ए-दोस्त की तकमील नहीं
घर भी उजड़े तो बयाबाँ नहीं होने पाता

यूँ भी इक उम्र गुज़र जाती है मिलते मिलते
एक को एक का इरफ़ाँ नहीं होने पाता

'शोर' ख़ामोश नहीं मेरे ही ज़िंदाँ के चराग़
शहर-ए-ख़ूबाँ भी चराग़ाँ नहीं होने पाता