EN اردو
वो मर्द है जो कभी शिकवा-ए-जफ़ा न करे | शाही शायरी
wo mard hai jo kabhi shikwa-e-jafa na kare

ग़ज़ल

वो मर्द है जो कभी शिकवा-ए-जफ़ा न करे

जिगर बरेलवी

;

वो मर्द है जो कभी शिकवा-ए-जफ़ा न करे
लबों पे दम हो मगर नाला-ओ-बुका न करे

किसी का मुझ पे कुछ एहसान हो ख़ुदा न करे
दवा तो क्या मिरे हक़ में कोई दुआ न करे

कहाँ से जान पड़े ज़िंदगी के मुर्दों में
अदा-ए-हुस्न क़यामत अगर बपा न करे

अदा-ए-बे-ख़बरी है कि इक तिलिस्म-ए-जमाल
निगाह-ए-शौक़ से वाक़िफ़ हों वो ख़ुदा न करे

ग़रज़ मुझे न दर-ए-ताजदार तक ले जाए
सलाम करने की हाजत पड़े ख़ुदा न करे

कोई अज़ाब-ए-जहन्नम में मुब्तला हो जाए
उरूज पा के ज़मीं पर गिरे ख़ुदा न करे

न दिल में दर्द किसी के लिए न पास-ए-वफ़ा
हम ऐसे आरिफ़-ए-ख़ुद-काम हों ख़ुदा न करे

बुज़ुर्ग बन के मैं बैठूँ ये हो नहीं सकता
कोई बड़ा मुझे समझे 'जिगर' ख़ुदा न करे