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वो ख़्वाब दिखाते है साकार नहीं करते | शाही शायरी
wo KHwab dikhate hai sakar nahin karte

ग़ज़ल

वो ख़्वाब दिखाते है साकार नहीं करते

ज्योती आज़ाद खतरी

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वो ख़्वाब दिखाते है साकार नहीं करते
उल्फ़त से मगर खुल के इंकार नहीं करते

बस बात कोई उन को समझा दे ये इतनी सी
रिश्तों में कभी कोई व्यापार नहीं करते

दिल उस ने किया छलनी बे-रहमी से पेश आया
दुश्मन पे भी हम अपने यूँ वार नहीं करते

देखा है मोहब्बत में बरबाद हुए कितने
हम दिल को बचाते है बीमार नहीं करते

तूफ़ान कोई आए इस राह-ए-मोहब्बत में
इस दिल को कभी अपने बेज़ार नहीं करते

हम अच्छे बुरे जैसे भी सामने है सब के
हम अपनी हक़ीक़त से इंकार नहीं करते

माना की हुए ज़ख़्मी ये क़ल्ब-ओ-जिगर लेकिन
हम ज़ख़्म छुपाते हैं अख़बार नहीं करते