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वो जब आप से अपना पर्दा करें | शाही शायरी
wo jab aap se apna parda karen

ग़ज़ल

वो जब आप से अपना पर्दा करें

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

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वो जब आप से अपना पर्दा करें
तो बंद-ए-क़बा किस तरह वा करें

अगर हम न उन की तमन्ना करें
तो वो हम पे क्यूँ नाज़ बेजा करें

उसे लोग क्यूँ मेहर-ए-ताबाँ कहें
जिसे दूर से भी न देखा करें

किया उस ने क़त्ल और मैं ने मुआ'फ़
अबस अहल-ए-शहर उस का चर्चा करें

फिरे क़ैस आवारा हम वो नहीं
कि माशूक़ को अपनी रुस्वा करें

मिरे दर्द-ए-दिल की ही पुर्सिश दवा
अगर मुझ को पूछें तो अच्छा करें

ख़ुदा बे-नियाज़ और बुत संग-दिल
कहो किस से हम राह पैदा करें

चलो फिर कहें उन से हम हाल-ए-दिल
यही फिर कहेंगे कि हम क्या करें

जिन्हें फ़स्ल-ए-गुल में न हो दस्तरस
कि सामान-ए-इशरत मुहय्या करें

वो क़ुमरी-ओ-बुलबुल को मुतरिब बनाएँ
गुल-ओ-सर्व को जाम-ओ-मीना करें

उन्हें क्या हो 'नाज़िम' क़यामत का डर
जो हर रोज़ इक फ़ित्ना बरपा करें