वो जा चुका है तो क्यूँ बे-क़रार इतने हो
मोहब्बत उस से करो जिस को भूल सकते हो
निशान-ए-मंज़िल-ए-जाँ गर नहीं मिला न सही
चलो सफ़र तो किया है कहीं तो पहुँचे हो
तमाम उम्र न मिलने का हौसला ही सही
तुम अपने दिल में कोई आरज़ू तो रखते हो
सफ़र भी तुम ने किया आफ़्ताब की सूरत
अभी तक अपने ही नक़्श-ए-क़दम पे चलते हो
जो रौशनी है दिलों में अता तुम्हारी है
चराग़ तुम सा नहीं तुम चराग़ जैसे हो
दिलों के सोए हुए ग़म अभी तो जागे हैं
ज़रा सी देर तो बैठो अभी तो आए हो
तुम्हारे लहजे का ये ज़ेर-ओ-बम क़यामत है
कभी रफ़ीक़ कभी ना-शनास लगते हो
ख़ुदा सुना है रग-ए-जाँ के पास रहता है
मगर तुम और भी नज़दीक आते जाते हो
तमाम दिन रही साए की जुस्तुजू 'शहज़ाद'
हुई है रात तो आँखें तलाश करते हो
ग़ज़ल
वो जा चुका है तो क्यूँ बे-क़रार इतने हो
शहज़ाद अहमद

