वो इक लफ़्ज़ जो बे-सदा जाएगा
वही मुद्दतों तक सुना जाएगा
कोई है जो मेरे तआक़ुब में है
मुझे मेरा चेहरा दिखा जाएगा
वो इक शख़्स जो दुश्मन-ए-जाँ सही
मगर फिर भी अपना कहा जाएगा
जलेगी कोई मिशअल-ए-जाँ अभी
मगर फिर अंधेरा सा छा जाएगा
नफ़ी-ए-जुरअत-ए-हक़-नुमाई सही
मगर कब किसी से कहा जाएगा
यहाँ इक शजर मुंतज़िर सा भी है
अब आख़िर कहाँ तक चला जाएगा
मैं वो मिशअल-ए-नीम-शब हूँ 'अमीर'
जिसे कल का सूरज बुझा जाएगा
ग़ज़ल
वो इक लफ़्ज़ जो बे-सदा जाएगा
अमीर क़ज़लबाश

