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वो हों मुट्ठी में उन की दिल हो हम हों | शाही शायरी
wo hon muTThi mein unki dil ho hum hon

ग़ज़ल

वो हों मुट्ठी में उन की दिल हो हम हों

रियाज़ ख़ैराबादी

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वो हों मुट्ठी में उन की दिल हो हम हों
यूँही पर्दा सा कुछ हाइल हो हम हों

सताएँ हम उसी तरह जिस तरह चाहें
कोई नश्शे में यूँ ग़ाफ़िल हो हम हों

तुम्हारा बाम रश्क-ए-आसमाँ हो
अगर तुम हो मह-ए-कामिल हो हम हों

मज़ा ख़ल्वत का आए क़त्ल-गह में
वहाँ कोई न हो क़ातिल हो हम हों

हर इक गोशे में जैसे हश्र बरपा
नए फ़ित्ने हों वो महफ़िल हो हम हों

नहीं पर्वा न सब्ज़ा हो लब-ए-जू
ये मीना हो लब-ए-साहिल हो हम हों

हमारे हाथ में हो तेग़ क़ातिल
न हो कोई अदू बिस्मिल हो हम हों

गिरह हो ज़ुल्फ़ की दिल में हमारे
हमारा उक़्दा-ए-मुश्किल हो हम हों

पुराने नज्द में अब हों नए आज
नई लैला नया महमिल हो हम हूँ

यूँही हम अपनी हस्ती से गुज़र जाएँ
हमारी सई-ए-ला-हासिल हो हम हों

ये कम-बख़्त इक जहान-ए-आरज़ू है
न हो कोई हमारा दिल हो हम हों

न हम उट्ठें न कोई हाथ उठाए
गले पर ख़ंजर-ए-क़ातिल हो हम हों

ये सहव-ओ-महव हों हम सैर-ए-गुल में
हर इक ग़ुंचा हमारा दिल हो हम हों

'रियाज़' उस शोख़ को भी तुम सुना दो
वो क्या है चुलबुला सा दिल हो हम हों