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वो हो इलाज-ए-दर्द मुदावा कहें जिसे | शाही शायरी
wo ho ilaj-e-dard mudawa kahen jise

ग़ज़ल

वो हो इलाज-ए-दर्द मुदावा कहें जिसे

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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वो हो इलाज-ए-दर्द मुदावा कहें जिसे
ऐसा तो हो कोई कि मसीहा कहें जिसे

पुर्सान-ए-हाल कोई नहीं जिस का नाम लें
इक दर्द दिल ही है कि शनासा कहें जिसे

मुश्किल ये है कि आप तो सुनते ही कुछ नहीं
रूदाद-ए-इश्क़ वो कि फ़साना कहें जिसे

जल्वे से देखिए कहीं आँखें झपक न जाएँ
यूँ चश्म वा हो ज़ौक़-ए-तमाशा कहें जिसे

अल्लाह ऐसी दे तुझे तौफ़ीक़ ऐ जुनूँ
सर में वो धुन समाए कि सौदा कहें जिसे

सब हसरतों को ख़ाक में ज़ालिम मिला दिया
अब दिल में क्या रहा कि तमन्ना कहें जिसे

ये बार-ए-ज़िंदगी कहीं हल्का न 'शौक़' हो
इतना तो हो कि हासिल-ए-दुनिया कहें जिसे