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वो दुख नसीब हुए ख़ुद-कफ़ील होने में | शाही शायरी
wo dukh nasib hue KHud-kafil hone mein

ग़ज़ल

वो दुख नसीब हुए ख़ुद-कफ़ील होने में

अज़ीज़ नबील

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वो दुख नसीब हुए ख़ुद-कफ़ील होने में
कि उम्र कट गई ख़ुद की दलील होने में

मुसाफ़िरों के क़दम डगमगाए जाते थे
अजब नशा था सफ़र के तवील होने में

वो एक संग जो रस्ते में ईस्तादा था
उसे ज़माने लगे संग-ए-मील होने में

मुनाफ़िक़ीन से ख़तरा कभी ग़नीम का ख़ौफ़
क़यामतें हैं बहुत बे-फ़सील होने में

अज़ीज़ होने में आसानियाँ बहुत सी थीं
बहुत से दर्द मिले हैं 'नबील' होने में