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वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है अपनी ज़बाँ और हम | शाही शायरी
wo dekha KHwab qasir jis se hai apni zaban aur hum

ग़ज़ल

वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है अपनी ज़बाँ और हम

इंशा अल्लाह ख़ान

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वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है अपनी ज़बाँ और हम
कि गोया एक जा है उस में है वो नौजवाँ और हम

वो रो रो मुझ से कहता है ख़ुदा की बातें हैं वर्ना
भला टुक दिल में अपने ग़ौर कर तू ये मकाँ और हम

जो पूछा क़ैस से लैला ने जंगल में अकेले हो
तो बोले ऐ नहीं वहशत है और आह-ओ-फ़ुग़ाँ और हम

अजी गड़बड़ रही है अक़्ल अपने सब फ़रिश्तों से
पड़े फिरते हैं बाहम सैर करते क़ुदसियाँ और हम

नशा है आलम-ए-मस्ती है बे-क़ैदी है रिंदी है
कहाँ अब ज़ोहद-ओ-तक़्वा है ख़राबात-ए-मुग़ाँ और हम

नियाबत हम को रिज़वाँ की मिली मौला के सदक़े से
वगर्ना ओहदा-ए-दरबानी-ए-बाग़-ए-जिनाँ और हम

अजब रंगीनियाँ बातों में कुछ होती हैं ऐ 'इंशा'
बहम हो बैठते हैं जब सआदत-यार-ख़ाँ और हम