वो बेवफ़ा ही सही उस को बेवफ़ा न कहो
अदब की हद में रहो हुस्न को बुरा न कहो
शराब-ए-इश्क़ की अज़्मत से जो करे इंकार
वो पारसा भी अगर हो तो पारसा न कहो
पड़ा है काम उसी ख़ुद-परस्त काफ़िर से
जिसे ये ज़िद है किसी और को ख़ुदा न कहो
मिरा ख़ुलूस-ए-मोहब्बत है क़द्र के क़ाबिल
ज़बाँ पे ज़िक्र-ए-वफ़ा है उसे गिला न कहो
ये क्या कहा कि दुआ है असर से बेगाना
तड़प न दिल की हो जिस में उसे दुआ न कहो
ये और कुछ नहीं फ़ितरत की बद-मज़ाक़ी है
बग़ैर बादा घटा को कभी घटा न कहो
तड़प तड़प के गुज़ारो शब-ए-फ़िराक़ अपनी
ये नाज़-ए-हुस्न है 'शाइर' इसे जफ़ा न कहो
ग़ज़ल
वो बेवफ़ा ही सही उस को बेवफ़ा न कहो
शायर फतहपुरी

