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वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए | शाही शायरी
wo be-ruKHi ki taghaful ki intiha kahiye

ग़ज़ल

वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए

सुरूर बाराबंकवी

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वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए
ब-ईं-हमा उसे किस दिल से बे-वफ़ा कहिए

ग़म-ए-हयात ओ ग़म-ए-काएनात से हट कर
किसी की क़ामत ओ गेसू का माजरा कहिए

वो मुन्फ़इल हो कि हो मुश्तइल बला से मगर
कभी तो हाल-ए-दिल-ए-ज़ार-ए-बरमला कहिए

बताइए कफ़-ए-महबूब दस्त-ए-क़ातिल को
लहू के दाग़ को गुल-कारी-ए-हिना कहिए

अदब का है ये तक़ाज़ा कि उस की महफ़िल में
सुकूत-ए-नाज़ को भी नग़्मा ओ सदा कहिए

हम अपने दौर में जिस बाँकपन से ज़िंदा हैं
उसे हम अहल-ए-मोहब्बत का हौसला कहिए

'सुरूर' हज़रत-ए-ग़ालिब के रंग में भी कभी
हिकायत-ए-करम-ए-चश्म-ए-सुर्मा-सा कहिए