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वो बे-असर था मुसलसल दलील करते हुए | शाही शायरी
wo be-asar tha musalsal dalil karte hue

ग़ज़ल

वो बे-असर था मुसलसल दलील करते हुए

आलोक मिश्रा

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वो बे-असर था मुसलसल दलील करते हुए
मैं मुतमइन था ग़ज़ल को वकील करते हुए

वो मेरे ज़ख़्म को नासूर कर गए आख़िर
मैं पुर-उमीद था जिन से अपील करते हुए

अजीब ख़्वाब था आँखों में ख़ून छोड़ गया
कि नींद गुज़री है मुझ को ज़लील करते हुए

सबब है क्या कि मैं सैराब हूँ सर-ए-सहरा
जुदा हुआ था वो आँखों को झील करते हुए

मरा हुआ मैं वो किरदार हूँ कहानी का
जो जी रहा है कहानी तवील करते हुए