EN اردو
वो बर्क़-ए-नाज़ गुरेज़ाँ नहीं तो कुछ भी नहीं | शाही शायरी
wo barq-e-naz gurezan nahin to kuchh bhi nahin

ग़ज़ल

वो बर्क़-ए-नाज़ गुरेज़ाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

रविश सिद्दीक़ी

;

वो बर्क़-ए-नाज़ गुरेज़ाँ नहीं तो कुछ भी नहीं
मगर शरीक-ए-रग-ए-जाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

हज़ार दिल है तिरा मशरिक़-ए-मह-ओ-ख़ुर्शीद
ग़ुबार-ए-मंज़िल-ए-जानाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

बहार-ए-गुल-कदा-ए-नाज़ दिल-कुशा है मगर
नसीम-ए-शौक़ ख़िरामाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

है ख़ल्वत-ए-दिल-ए-वीराँ ही मंज़िल-ए-महबूब
ये ख़ल्वत-ए-दिल-ए-वीराँ नहीं तो कुछ भी नहीं

हर एक साँस हो आतिश-कदा तो क्या हासिल
गुदाज़ शोला-ए-पिन्हाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

बग़ैर इश्क़ है रूदाद-ए-ज़िंदगी तारीक
ये लफ़्ज़ ज़ीनत-ए-उनवाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

बहुत बुलंद है दिल का मक़ाम-ए-ख़ुद्दारी
मगर शिकस्त का इम्काँ नहीं तो कुछ भी नहीं

सुकून-ए-शौक़ हो या इज़्तिराब-ए-शौक़ 'रविश'
अगर ब-मंज़िला-ए-जाँ नहीं तो कुछ भी नहीं