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वो अपने बंद-ए-क़बा खोलती तो क्या लगती | शाही शायरी
wo apne band-e-qaba kholti to kya lagti

ग़ज़ल

वो अपने बंद-ए-क़बा खोलती तो क्या लगती

अमीर इमाम

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वो अपने बंद-ए-क़बा खोलती तो क्या लगती
ख़ुदा के वास्ते कोई कहे ख़ुदा-लगती

यक़ीन थी तो यक़ीं में समा गई कैसे
गुमान थी तो गुमाँ से भी मावरा लगती

अगर बिखरती तो सूरज कभी नहीं उगता
तिरा ख़याल कि वो ज़ुल्फ़ बस घटा लगती

तिरे मरीज़ को दुनिया में कुछ नहीं लगता
दवा लगे न रक़ीबों की बद-दुआ' लगती

हुई है क़ैद ज़माने में रौशनी किस से
भला वो जिस्म और उस को कोई क़बा लगती

लगी वो तुझ सी तो आलम में मुनफ़रिद ठहरी
वगर्ना आम सी लगती अगर जुदा लगती