वो आरज़ू वो तमन्ना वो इज़्तिराब नहीं
मैं अब वहाँ हूँ जहाँ कोई बारयाब नहीं
तिरी नज़र है जिसे इंक़लाब कहते हैं
तिरी नज़र के सिवा कोई इंक़लाब नहीं
तिरी निगाह की शौक़-आफ़रीनियाँ तौबा
जो कामयाब है वो भी तो कामयाब नहीं
ग़म-ए-फ़िराक़ की बे-कैफ़ियाँ ख़ुदा की पनाह
शराब में भी तो कैफ़िय्यत-ए-शराब नहीं
मुझे पुकार रहे हैं सनम-कदे वाले
मिरी दुआएँ जो का'बे में मुस्तजाब नहीं
सब इंक़लाब थे उन की निगाह फिरने तक
अब आसमान की गर्दिश में इंक़लाब नहीं
जब इल्तिफ़ात न था इश्तियाक़ रहता था
अब इल्तिफ़ात हुआ है तो दिल को ताब नहीं
वहीं से उठते हैं हर इंक़लाब के बादल
वो मय-कदा कि जहाँ कोई इंक़लाब नहीं
मिरी नज़र को न थी ताब उन के जल्वों की
अब उन के जल्वों को मेरी नज़र की ताब नहीं
बदल गए हैं शब-ओ-रोज़-ए-ज़िंदगी 'बिस्मिल'
वो माहताब नहीं अब वो आफ़्ताब नहीं
ग़ज़ल
वो आरज़ू वो तमन्ना वो इज़्तिराब नहीं
बिस्मिल सईदी

