वो आदमी जो तिरी आरज़ू में मरता है
वो तुझ से प्यार नहीं ख़ुद से इश्क़ करता है
फ़ज़ा में ख़ौफ़ के परचम बुलंद होते हैं
सवाद-ए-शाम से लश्कर कोई गुज़रता है
मिरी ज़मीं के बुलावे ग़ज़ब के हैं लेकिन
कोई जुनूँ मिरे पर रात-दिन कतरता है
मैं अपने आप को अब किस के चाक पर रक्खूँ
शिकस्ता ज़र्फ़ दोबारा कहीं सँवरता है
लगे हुए हैं जहाँ पर विसाल के खे़मे
उधर से हिज्र का रहवार भी गुज़रता है
ग़ज़ल
वो आदमी जो तिरी आरज़ू में मरता है
असअ'द बदायुनी

