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वतन से दूर यारान-ए-वतन की याद आती है | शाही शायरी
watan se dur yaran-e-watan ki yaad aati hai

ग़ज़ल

वतन से दूर यारान-ए-वतन की याद आती है

अली सरदार जाफ़री

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वतन से दूर यारान-ए-वतन की याद आती है
क़फ़स में हम-नवायान-ए-चमन की याद आती है

ये कैसा ज़ुल्म है फिर साया-ए-दीवार-ए-ज़िन्दाँ में
वतन के साया-ए-सर्व-ओ-समन की याद आती है

तसव्वुर जिस से रंगीं है तख़य्युल जिस से रक़्साँ है
ग़ज़ाल-ए-हिंद-ओ-आहू-ए-ख़ुतन की याद आती है

कभी लैला-ओ-शीरीं गाह हीर-ओ-सोहनी बन कर
निराले यार की बाँके सजन की याद आती है

कहाँ का ख़ौफ़-ए-ज़िन्दाँ दहशत-ए-दार-ओ-रसन कैसी
क़द-ए-माशूक-ओ-ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन की याद आती है