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वस्ल में आपस की हुज्जत और है | शाही शायरी
wasl mein aapas ki hujjat aur hai

ग़ज़ल

वस्ल में आपस की हुज्जत और है

हफ़ीज़ जौनपुरी

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वस्ल में आपस की हुज्जत और है
इस शकर-रंजी में लज़्ज़त और है

कुछ नहीं वादा-ख़िलाफ़ी का गिला
आप से हम को शिकायत और है

सुब्ह होते ही बदल जाएगी आँख
रात भर उन की इनायत और है

वाज़ कहता है जो मय-ख़ाने के पास
मय-कशो वाइज़ की नीयत और है

साँस उखड़ी है तिरे बीमार की
अब कोई दम की मुसीबत और है

हूरें भी अच्छी हैं ऐ ज़ाहिद मगर
इन परी-ज़ादों की सूरत और है

इल्म जौहर है 'हफ़ीज़' इंसान का
सच है लेकिन आदमियत और है