वस्ल बनने का कुछ बनाव नहीं
वाँ लगा दिल जहाँ लगाव नहीं
पाँव क्यूँ दाबने नहीं देते
गर किसी का तुम्हें दबाव नहीं
ज़ख़्म-ए-दिल का इलाज क्या कीजे
क़ाबिल-ए-मरहम अपना घाव नहीं
ऐसे दरिया में बह चले हैं कि आह!
जिस में टापू नहीं है नाव नहीं
है बहुत जल्वा-गाह-ए-यार बुलंद
देखें क्या याँ से कुछ दिखाव नहीं
बल बे तेरी सजावटें अल्लाह
कुछ क़यामत है ये बनाव नहीं
दस्तरस वाँ ज़रा नहीं और हाए
दिल में क्या क्या हमारे चाव नहीं
ले के दिल यूँ कहे है चितवन में
अब मिरी बज़्म में तुम आओ नहीं
दर्द-ए-पिन्हाँ से जी ही निकले है
क्या कहें तुम से कुछ छुपाव नहीं
गर सफ़र को सिधारे हो तो आओ
जा के वाँ छावनी तू छाव नहीं
क्यूँकि 'जुरअत' लगाएँ हम लग्गा
कि फ़रिश्ते का वाँ लगाव नहीं
और तो और चोरी चोरी से
बात कर लेने का भी दाव नहीं
ग़ज़ल
वस्ल बनने का कुछ बनाव नहीं
जुरअत क़लंदर बख़्श

