वक़्त से पहले दरख़्तों पे समर आने लगे
रात आई भी नहीं ख़्वाब-ए-सहर आने लगे
मैं ने पहला ही क़दम रक्खा है दरिया में अभी
ख़ैर-मक़्दम के लिए कितने भँवर आने लगे
क्या ख़ता हो गई सरज़द मैं इसी सोच में हूँ
संग के बदले मिरी सम्त गुहर आने लगे
इस लिए ज़िल्ल-ए-इलाही से ख़फ़ा हैं रातें
उन के ऐवान में क्यूँ ख़ाक-बसर आने लगे
आप कुछ और हैं आशिक़ इसे कहते हैं मियाँ
जिस को हर चीज़ में महबूब नज़र आने लगे
ख़ैर माँगें किसी दुश्मन के लिए अब 'आलम'
ऐन मुमकिन है दुआओं में असर आने लगे
ग़ज़ल
वक़्त से पहले दरख़्तों पे समर आने लगे
आलम ख़ुर्शीद

