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वक़्त के तक़ाज़ों को इस तरह भी समझा कर | शाही शायरी
waqt ke taqazon ko is tarah bhi samjha kar

ग़ज़ल

वक़्त के तक़ाज़ों को इस तरह भी समझा कर

मोहसिन भोपाली

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वक़्त के तक़ाज़ों को इस तरह भी समझा कर
आज की गवाही पर मत क़यास-ए-फ़र्दा कर

तेरे हर रवय्ये में बद-गुमानियाँ कैसी
जब तलक है दुनिया में ए'तिबार-ए-दुनिया कर

जिस ने ज़िंदगी दी है वो भी सोचता होगा
ज़िंदगी के बारे में इस क़दर न सोचा कर

हर्फ़ ओ लब से होता है कब अदा हर इक मफ़्हूम
बे-ज़बान आँखों की गुफ़्तुगू भी समझा कर

एक दिन यही आदत तुझ को ख़ूँ रुलाएगी
तू जो यूँ परखता है हर किसी को अपना कर

ये बदलती क़द्रें ही हासिल-ए-ज़माना हैं
बार बार माज़ी के यूँ वरक़ न उल्टा कर

ख़ूँ रुलाएँगे मंज़र मत क़रीब आ 'मोहसिन'
आईना-कदा है दहर दूर से तमाशा कर